वो बब्बर शेर, जिसके बारे में ‘इमाम ज़हबी (d. 748 हि.)’ जैसे नक़्क़ाद मुअर्रिख़ ने: ‘सियरु अअ़्लामिन् नुबला’ में ये अल्फ़ाज़ लिखे हैं कि:
“وأما شجاعته فحسبك ما أوردته من وقعاته ، فكان أسدا ضرغاما ، وأشجع فرسانه إقداما ، لا غضوبا ولا شتاما ، وقورا ، لا يضحك إلا تبسما…..”
“और रही उस (जलालुद्-दीन ख़्वारिज़्म-शाह) की बहादुरी, तो इसके लिए उतना काफ़ी है जो मैंने उसके बारे में बयान कर दिया;
वो खूंख़ार शेर था, और हमला करने में सबसे दिलेर था. ज़्यादा गुस्सैल और बकबक करने वाला नहीं था. बा-वक़ार था, सिर्फ़ मुस्कराता था….”
आगे तारीख़ी जुमला लिखते हैं:
“و هابته التتار، ولولاه لداسوا الدنيا”
“और ततारियों पर उसकी हैबत तारी थी;
अगर वो न होता, तो पूरी दुनिया को वो रौंद डालते.”
सियरु Ultimately नुबला, त़ब्क़ा नं. 33, जिल्द नं. 22, पेज नं. 327, पब्लिकेशन: मुअस्ससतुर् रिसालह (बेरूत), 1422 हि./2001 ई.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी अल्-अज़्हरी
09/02/25 ई.