ज़मीन: मुतह़र्रिक या साकिन

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तह़क़ीक़े आ़ला ह़ज़रत के तआ़रुफ में एक मुख़्तसर गुफ़्तगू
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आ़ला ह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) की इस उ़न्वान पर तीन किताबें हैं:

1. “फ़ौज़े मुबीन दर रद्दे हरकते ज़मीन”,
2. “नुज़ूले आयाते फुरक़ान बसुकूने ज़मीनो आसमान”,
3. “मुई़ने मुबीन बहरे दौरे शम्स व सुकूने ज़मीन”,

इसके अलावा कुछ बह़सें (ज़िमनी तौर पर), “अल् कलिमतुल् मुल्हमह” में भी हैं जो आपने ‘Ancient Greek Philosophy’ के रद में लिखी;

इन्हें समझने के लिए पहले ‘जदीद साइंसी उसूलों (Principles of Modern Science)’ और ‘मन्त़िक़ व फ़लसफ़ा (Logic & Philosophy)‘ की पूरी जानकारी होना ज़रूरी है;

आ़ला ह़ज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) ने सिर्फ़ ‘अक़्ली दलीलें (Rational Proofs)‘ ही नहीं, बल्कि (किताब न. 2 में) क़ुरआन से, और (किताब न. 1 व 3 में भी कहीं कहीं हाशिये में क़ुरआन और) ह़दीस से नक़्ली दलाइल (Narrative Proofs) भी दिए हैं, जबकि अस्ल में किताब नं. 1 व 3 ख़ालिस Physics, Astrology, Geography, Geometry वग़ैरह के उसूलों से भरी पड़ी हैं, जिनका आजतक कोई तोड़ नहीं पेश कर सका. साथ ही साथ बड़े बड़े वैज्ञानिक जैसे कि ‘अल्बर्ट आइन्सटाइन (या आइन्सटीन)’, ‘आइज़क न्यूटन’ वगैरह की थ्योरीज़ को भी उन्हीं के उसूलों (Principles) की बुनियाद पर जड़ से उखाड़ फेंका है. ख़ास तौर पर ‘न्यूटन’ की ‘Gravity’, और ‘Repulsion’ का ज़बरदस्त पीछा किया, और शदीद रद करके इन्हें बात़िल साबित किया;

क़ुरआन व ह़दीस को आगे रखना ही अस्ल बुनियाद हैं आ़ला ह़ज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) की तहक़ीक़ात में, उन्हीं को साबित करने के लिए साइंसी उसूलों पर बहस करते हैं;

ज़रूरत पड़ने पर, यूनानी साइंस के ग़लत नज़रियों को तोड़ने के लिए, ‘मन्त़िक़ व फ़लसफ़ा (Logic & Philosophy)‘ का ज़बर्दस्त इस्तेमाल किया है.

आ़ला ह़ज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) की पूरी तहक़ीक़ का मदारसूरह फ़ातिर’ की इस आयत पर है, अल्लाह (ﷻ) ने क़ुरआन 35:41 में इरशाद फ़रमाया:

“إِنَّ اللَّهَ يُمْسِكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ أَن تَزُولَا”،

“बेशक, अल्लाह रोके हुए है, आसमानों और ज़मीन को, कि जुम्बिश (हरकत) न करें.”

[कंज़ुल् ईमान]

इस आयत की तफ़्सीर ख़ुद सह़ीह़ व ह़सन ह़दीसों से स़ह़ाबा-ए-किराम (रद़ियल्लाहु अ़न्हुम) से मनक़ूल है, जिसमें वाज़िह़ तौर पर ज़मीन की मुत़्लक़ ह़रकत की नफ़ी की गयी है, चाहें ‘Revolutional (सूरज के इर्दगिर्द)’ हो, या ‘Rotational (अपने अक्ष/धुरी पर)’,

स़ह़ाबा-ए-किराम (रद़ियल्लाहु अ़न्हुम) ने इस आयत से मुत़्लक़ ह़रकते ज़मीन की नफ़ी ही मुराद ली है, मुलाह़ज़ा फ़रमायें:

عن قتادة، قال: بلغ حذيفة أن كعبا يقول: ‘إن السماء تدور على قطب كالرّحى.’ فقال: كذب كعب، إن اللَّه يقول: ‘إِنَّ اللَّهَ يُمْسِكُ السَّماواتِ وَالْأَرْضَ أَنْ تَزُولَا'”،

“ह़ज़रत क़तादा (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) से रिवायत है कि ह़ज़रत ह़ुज़ैफा (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) के पास ये ख़बर पहुंची कि ह़ज़रत कअ़बे अहबार (जो नया नया ईमान लाए थे) कहते हैं कि, ‘आसमान एक धुरी पर घूमता है जैसे कि चक्की (का पाट).’
तो ह़ज़रत ह़ुज़ैफा (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने फ़रमाया: कअ़ब ने ग़लत कहा. बेशक, अल्लाह फ़रमाता है: ‘यक़ीनन, अल्लाह रोके हुए है आसमानों और ज़मीन को, कि जुम्बिश (हरकत) न करें’.”

देखें! ह़ज़रत ह़ुज़ैफा (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने यही आयत तिलावत की, जो आ़ला ह़ज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) की तहक़ीक़ात का मदार है;

इस ह़दीस को बड़े बड़े मुफ़स्सिरीन ने इसी आयत की तफ़्सीर के तह़त रिवायत किया है. जैसे:
‘इमाम जलालुद्-दीन सुयूती’ ने ‘अद् दुर्रुल् मन्सूर’ में;
‘इमाम शम्सुद्-दीन क़ुरत़बी’ ने ‘अल् जामिअ़ लि अह़कामिल् क़ुरआन (तफ़्सीरे क़ुरत़बी)’ में;
‘इमाम इब्ने जरीर त़बरी’ ने ‘जामिउ़ल् बयान (तफ़्सीरे त़बरी)’ में;
‘इमाम सय्यिद मह़मूद आलूसी’ ने ‘रूह़ुल् मआ़नी’ में;
इसके अलावा ‘इमाम इब्ने ह़जर अ़स्क़लानी’ ने ‘अल् इसाबह फ़ी तम्यीज़िस् सह़ाबा’ में फ़रमाया:

وأخرج ابن أبي خيثمة بسند حسن“،

“और (इस ह़दीस) को इब्ने अबी ख़ैसुमा ने, सनदे ह़सन के साथ रिवायत किया.”

यहां तक कि ‘इमाम अ़ब्दुल क़ाहिर इब्ने त़ाहिर बग़दादी तमीमी (d. 429 हि.)’ ने अपनी किताब: ‘अल् फ़र्क़ बैनल् फिरक़’ में ज़मीन के सुकून (रुके हुए होने) पर अहले सुन्नत का इज्माअ़ नक़्ल किया है, वो लिखते हैं:

وأجمعوا على وقوف الأرض وسكونها، وأن حركتها إنما تكون بعارض يعرض لها من زلزلة ونحوها”،

“ज़मीन के रुके व ठहरे हुए होने पर (अहले सुन्नत के) लोगों का इजमाअ़ है. ज़मीन की हरकत ज़लज़ले वग़ैरह जैसी आ़रिज़ी चीज़ों की वजह से ‘आ़रिज़ी (Temporary)’ होती है.”

अल्-फ़र्क़ बैनल् फिरक़, तीसरी फ़स्ल, दूसरा रुक्न, पेज नं. 261, पब्लिकेशन: अल् मक्-तबतुल् अ़स्-रिय्यह (बेरूत), 1439 हि. / 2018 ई.

साइंस का हर दावा सही नहीं, बहुत सी चीज़ों में ये क़ुरआन व ह़दीस से सख्त इख़्तिलाफ़ रखती है;

कुछ जाहिल, जिन्हें इस्तिन्जा करने तक की शरई तमीज़ नहीं है, इस बात पर आ़ला ह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अ़लैहिर्रह़मह) का मज़ाक उड़ाते हैं, उनसे मेरा सवाल है:

(1) क्या कोई शख़्स, अगर आक़ा (ﷺ) का क़ौले मुबारक न दे सके, तो अस्लाफ में से किसी सहाबी, या किसी इमाम, या किसी मुज्तहिद, या किसी मुफस्सिर, या किसी मुहद्दिस ही का कोई क़ौल दे सकता है, जिसमें क़ुरआन व हदीस से ज़मीन की हरकत का सुबूत दिया हो❓

(2) हमारे बुज़ुर्गों ने हर एंगल से इस्लामी अक़ाइद का दिफ़ाअ़ किया, तो क्या वो इस बात को जानते नहीं थे या फिर हमें इस मैटर का हल ही दिए बिना ही चले गए, इस दारे फानी से❓

(3) क़ुरआन या हदीस से कोई भी एक वाज़िह दलील नहीं दे सकता, जिसमें ज़मीन को मुतहर्रिक (घूमता हुआ) कहा गया हो❓

(4) ख़ुद वह्हाबिय्यह के बड़े-बड़े मुउ़तबर उ़लमा भी ‘ज़मीन के रुके’ होने का नज़रिया रखते हैं. हम सुबूत के तौर पर उनकी तक़रीरों या फ़तावा के कुछ लिंक आपको देते हैं:

(a) इब्ने बाज़ (Former Vice chancellor of Madina University)

(b) सालिह़ फ़ौज़ान (Reliable of modern Wahhabiyyah)

(c) इब्ने उ़सैमिन (Reliable Muhaddith & Mufassir of Modern Wahhabiyyah)

(d) अब्दुल अ़ज़ीज़ बलात (Former Grand Mufti of Saudi)

(e) मुस्तफ़ा अ़दवी (Well known mufti of Wahhabiyyah)

(5) क्या वह्हाबिय्यह अपने इन मौलवियों को भी इसी तरह गालियां देंगे, जिस तरह आ़ला हज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) को दे रहे हैं❓

(6) क्या वह्हाबिय्यह अपने इन मौलवियों को भी ‘जाहिल मुल्ला’ कह कर पुकारेंगे, जिस तरह आ़ला हज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) के बारे में भौंक रहे हैं❓

(7) ‘अ़लीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ के बानी ‘सर सय्यिद अह़मद ख़ान’ का भी यही नज़रिया था कि ज़मीन नहीं घूमती, इसने भी इस टॉपिक पर एक किताब लिखी, जिसका नाम है: “क़ौले मतीन दर इब्त़ाले ह़रकते ज़मीन”,
ये किताब AMU के लाइब्रेरी में भी मौजूद है, और इस किताब को pdf में डाउनलोड करना चाहें, तो ये लीजिए उसका लिंक:

एक बात हमेशा याद रखें:

“इस्लाम की बुनियाद पर साइंस को परखा जाएगा, न कि साइंस की बुनियाद पर इस्लाम को.”

आज कल कुछ लोग, ज़बर्दस्ती क़ुरआन और हदीस के मअ़ना को अपनी अक़्ल के मुताबिक़ मोड़ने में लगे हुए हैं. अरबी का एक ह़र्फ़ भी नहीं आता, और क़ुरआन और हदीस समझने का दावा करने में लगे हैं.

अल्लाह तआ़ला समझ दे ऐसे लोगों को;
आमीन बिजाहि ह़बीबी (ﷺ 💚)

नोट: मैंने अपनी इस तह़रीर में किसी तरह की कोई साइंटिफिक बहस नहीं की है, बल्कि सिर्फ़ बतौरे तआ़रुफ़ व तम्हीद ही ये बातें लिखी हैं.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी
05/06/20 ई.

आज से दो साल पहले, 05/06/20 ई. को, मैंने एक तह़रीर लिखी थी जिसका उन्वान था: ‘ज़मीन मुतह़र्रिक या साकिन (तह़क़ीक़े आ़ला ह़ज़रत के तआ़रुफ़ में एक मुख़्तस़र गुफ़्तगू)’, जो काफ़ी मक़्बूल हुई;

इसे लिखने की वजह वही रही, जो उस वक़्त हर शख़्स अपने कानों से सुन रहा था, और आँखों से देख रहा था कि किस तरह मीडिया पर, कुफ़्फ़ार के ज़रिए, कुछ सुन्नी उ़लमा की वीडियो क्लिप्स दिखाकर, उनके ख़िलाफ़ कैसी-कैसी अ़य्याराना बातें की जा रही थीं;

जिसका पूरा फ़ायदा कुफ़्र-नवाज़ वह्हाबिय्यह, उर्दू नाम वाले लिबरलों और सैक्यूलरों ने जी भरकर उठाया, और आ़ला ह़ज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) के ख़िलाफ़ बकवासों के बाज़ार गर्म किए, जिसका फ़क़ीर ने तह़रीरी जवाब लिखा, और उन ‘सुफ़हा-उल्-अह़्लाम’ तक पहुंचाया भी गया, मगर बि-ह़म्दिल्लाह (ﷻ) अब तक उधर से कोई जवाब नहीं आया, मह़ज़ मुर्दनी-सी छाई हुई है;

इसमें हल्का का इज़ाफ़ा करते हुए फ़क़ीर कहता है:

इस जहालत के बाज़ार में सबसे ज़्यादा बदगोई करने वाले ‘ग़ैर मुक़ल्लिद/सलफ़ी/अह़ले ह़दीस’ थे, जो भूल गए कि:

शैख़ ह़मूद इब्ने अ़ब्दुल्लाह तुवैजिरी (d. 1413 हि.)‘, जो कि सऊ़दी के बहुत बड़े वह्हाबी आ़लिम गुज़रे हैं, जिनके इ़ल्म का डंका वह्हाबिय्यह के दरमियान बजता है, जिनकी शान में ‘अ़ब्दुल अ़ज़ीज़ इब्ने बाज़ (d. 1420 हि.)‘ ने भी क़लम चलाया, उन्होंने ‘ज़मीन के साकिन (रुके हुए)’ होने पर दो किताबें लिखीं:

1.अस़् स़वाइ़क़ुश् शदीदह अ़ला अत्बाइ़ल् हैअतिल् जदीदह’,

ये किताब 190 पेज पर मुश्तमिल, पहली बार 1388 हि. में सऊ़दी से छपी;

मज़े की बात ये है कि इस किताब पर तस़्दीक़ है: ‘मुफ़्तिए आ़ज़म व क़ाज़िल् क़ुज़ात (सऊ़दी) मुह़म्मद इब्ने इब्राहीम आले शैख़ (d. 1389 हि.)‘ की;

2. ‘ज़ैलुस़् स़वाइ़क़ लि-मह़्विल् अबात़ीलि वल् मख़ारिक़’,

ये किताब 359 पेज पर मुश्तमिल, 1390 हि. में सऊ़दी से छपी;

इस पर तस़्दीक़ है: ‘अ़ब्दुल्लाह इब्ने ह़ुमैद (d. 1402 हि.)‘ की, जिसे ‘मलिक फ़ैस़ल इब्ने अ़ब्दुल् अ़ज़ीज़ (d. 1395 हि.)‘ ने मस्जिदे ह़राम का मुदर्रिस व मुफ़्ती, और ‘इशराफ़े दीनी’ का हैड बनाया. फिर 1395 हि. में ‘मलिक ख़ालिद इब्ने अ़ब्दुल् अ़ज़ीज़ (d. 1402 हि.)‘ ने इसे ‘मज्लिसे क़ज़ा’ और ‘मज्लिसे फ़िक़्ही’ का हैड, और ‘हैअते किबारे उ़लमा’ का मेंबर बनाया;

ये दोनों किताबें अ़रबी में, नेट पर, ऑनलाइन और पीडीएफ फाइल की शक्ल में भी, मौजूद हैं;

क़ारिईन, ज़रा देखें!

ये वह्हाबिय्यह के वो सरग़ने हैं, जिनपर पूरी मौजूदा वह्हाबिय्यत टिकी हुई है. इन्होंने भी, ज़मीन के बारे में, बिल्कुल वही लिखा है, जो इमामे अहले सुन्नत आ़ला ह़ज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) ने लिखा है. मगर इनके चमचे, जिस तरह से अपनी बदतमीज़ी वाली ज़ुबान, आ़ला ह़ज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) के ख़िलाफ़ खोलते हैं, और अपना गुस्ताख़ क़लम इमाम के ख़िलाफ़ चलाते हैं, इसी तरह अपने इन गुरुघंटालों के ख़िलाफ़ कभी, न अपनी ज़ुबान खोल सकते हैं, और न ही अपना क़लम चला सकते हैं;

अल्ह़म्दुलिल्लाह (ﷻ);
इमामे अहले सुन्नत (अ़लैहिर्रह़मह) की तह़क़ीक़ की तस़्दीक़, ख़ुद इनके ही बड़े-बड़े उ़लमा कर रहे हैं.
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मुह़म्मद क़ासिमुल् क़ादिरी
20/07/22 ई.